स्वतंत्रता सेनानी

रानी लक्ष्मी बाई

जब भी बात नारी सशक्तिकरण की होगी तो महिलाओं के लिए आदर्श नाम झांसी की रानी लक्ष्मी बाई का होगा। चाहे वह बहादुर महिला की आदर्श के रूप में हों या किसी कमजोर महिला की प्रेरणा के लिए हर जगह उनके शौर्य की गाथा गायी जाती रहेगी। अपने अदम्य शौर्य, साहस एवं आत्मविश्वास के बल पर रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिये। अपने अप्रतिम कार्य से भारत की यह बहादुर बेटी भारतीय इतिहास में सदा के लिए अमर हो गयी। प्रायः लक्ष्मी बाई का नाम आते ही जेहन में झांसी का ही ध्यान आता है। झांसी के किले से नारी के उस रूप का लक्ष्मीबाई ने प्रदर्शन किया जो खासकर भारत में एक नियम दायरे और रूढ़ियों की बेड़ी में जकड़ी अपने को दीन-हीन दुर्बल अबला समझती थी। लेकिन लक्ष्मीबाई ने भारत में महिलाओं के लिए बनायी गयी पूरी परिभाषा ही बदल कर रख दी। उन्होंने न केवल महिलाओं के लिए बल्कि उन सभी को ऐसी राह दिखायी जिस पर चलकर अपने को शौर्यवान और मजबूत बनाया जा सकता है।  भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दीपक में अपने बलिदान से लक्ष्मी बाई ने ऐसी लौ जलाई जो भारत को स्वतंत्र कराने तक जलती रही। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाली रानी लक्ष्मी बाई की उम्र बेहद छोटी रही। कहा भी जाता है कि बड़े काम छोटी उम्र में ही किये जाते हैं। इस कहावत को रानी लक्ष्मी बाई ने चरितार्थ कर दिया। मात्र 23 वर्ष की छोटी सी उम्र में उन्होंने वह कर दिखाया जिसे बिरले ही करते हैं। वैसे तो लक्ष्मी बाई का ज्यादातर समय झांसी में ही व्यतीत हुआ। लेकिन उनका घनिष्ट जुड़ाव काशी से रहा। यदि उन्हें झांसी की रानी कहा जाता है तो काशी की बेटी के रूप में भी जाना जाता है। क्योंकि देश की इस वीर पुत्री का जन्म काशी के इस पावन भूमि पर ही हुआ है। इनका जन्म 19 नवम्बर 1835 ई0 को वाराणसी के भदैनी स्थित मराठी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे एवं माता का नाम भागीरथी बाई था। बचपन में इनका नाम मणिकर्णिका था प्यार से इन्हें लोग मनु भी बुलाते थे। छोटी सी मनु आस-पास के सभी लोगों की दुलारी थी। जब मनु मात्र 4 वर्ष की थी तभी उनकी माता भागीरथी बाई का निधन हो गया। जिसके बाद मनु के पिता उन्हें लेकर झांसी चले गये। वाराणसी में जिस स्थान पर मनु का जन्म हुआ और कुछ वर्ष बिताया वह स्थान आज हमारे लिए दर्शनीय स्थल बन चुका है। कुछ वर्ष पहले तक लक्ष्मी बाई की जन्म स्थली सरकारी उपेक्षा की शिकार रही लेकिन पिछले साल 2013 में इस स्थान का कायाकल्प हुआ। प्रदेश सरकार ने सरकारी बजट से लक्ष्मी बाई जन्म स्थली को बेहतरीन रूप दे दिया है। लक्ष्मी बाई के जन्म स्थली के उस पावन स्थान को जहां देश की इस वीरांगना की किलकारियां गूंजी थी बेहद आकर्षक बना दिया है। खुले आसमान के नीचे पूरे परिसर को गुलाबी रंग के पत्थरों से बनाया गया है। जिसके मध्य में रानी लक्ष्मी बाई की घोड़े पर बैठी हाथ में तलवार लिये अंग्रेजों को ललकारती सुनहरे रंग की विशाल एवं आकर्षक प्रतिमा स्थापित है। इस मूर्ति के पीछे पत्थर की दीवार पर लक्ष्मीबाई से जुड़े कई घटनाओं को चित्र के रूप उभारा गया है। जैसे- मनु का बाल गंगाधर राव से विवाह, बाजीराव पेशवा की देख-रेख में प्रशिक्षण लेती मनु, दामोदर राव को गोद में लिये लक्ष्मी बाई, अंग्रेजों द्वारा दामोदर को झांसी का उत्तराधिकारी न स्वीकार किया जाना, गंगाधर राव के देहावसान पर शोकाकुल बैठीं लक्ष्मीबाई के चित्र दीवारों पर उभारे गये हैं। जिन्हें देखने से ऐसा लगता है जैसे उक्त घटनायें सामने घटित हो रही हैं। पार्कनुमा बने इस स्थान के बाहर गेट लगा हुआ है। इस स्थान को देखने काफी संख्या में लोग आते रहते हैं। अस्सी चौराहे से करीब आधा किलोमीटर दूर स्थित यह स्थान भदैनी बी0 1/190-91 में है। इस स्थान से तुलसी घाट एवं अस्सी घाट दोनों नजदीक हैं। अस्सी चौराहे के पास लक्ष्मी बाई जन्म स्थली तक जाने के लिए बोर्ड भी लगा हुआ है।

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