
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में नगर परिषद (वर्तमान में नगर निगम) द्वारा घाट का पक्का निर्माण कराया गया था। स्थानीय लोगों के अनुसार प्राचीन समय में घाट के उपरी भाग पर गल्ला मण्डी (अनाज क्रय-विक्रय का केन्द्र) लगती थी जिसे स्थानीय लोगों में ‘गोला’ कहा। मण्डी लगने से यह घाट गोलाघाट के नाम से प्रचलित हो गया। घाट का उल्लेख जेम्स प्रिसेंप ने भी किया है। घाट क्षेत्र में भृगुकेशव (विष्णु) मंदिर स्थापित है। वर्तमान में घाट पक्का है लेकिन धोबियों द्वारा घाट पर कपड़ा साफ करने के कारण स्थानार्थियों की संख्या बहुत कम होती है। सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने घाट का नवनिर्माण कराया था।
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